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सोमवार को उपेंद्र कुशवाहा ने पीएम मोदी को अपना इस्तीफा भेजा. ...

उपेंद्र कुशवाहा का त्याग पत्र: 'आपके नेतृत्व से मैं खुद को ठगा महसूस कर रहा हूं प्रधानमंत्री जी'

रालोसपा प्रमुख और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए का साथ छोड़ दिया है. सोमवार को उपेंद्र कुशवाहा ने पीएम नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा भेजा. पीएम को भेजे गए इस इस्तीफे में कुशवाहा ने कई कारणों का हवाला देते हुए अपना इस्तीफा मंजूर करने की मांग की है. कुशवाहा के एनडीए से जाने के कयास कई दिन से लगाए जा रहे थे जिसे सोमवार को उन्होंने दूर कर दिया. कुशवाहा ने अपने इस्तीफे में लिखा है..

माननीय प्रधानमंत्री जी,

आपके नेतृत्व में करीब पांच साल पहले बड़ी उम्मीदों के साथ मैं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल हुआ था। 2014 के लोकसभा चुनाव में आपने बिहार और देश के लोगों से कई वादे किए थे। इसी आलोक में मैंने आपको बिना शर्त समर्थन दिया था। हमें उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री रहते हुए आप बिहार के हितों को ध्यान में रखते हुए उन वादों को पूरा करेंगे जो आपने गरीबों और किसानों से किया था, ताकि भारत को पारदर्शी और जिम्मेदार सरकार दी जा सके। बिहार की अवाम ने आप पर भरोसा और विश्वास करते हुए एनडीए को अपना समर्थन दिया और लोकसभा की 40 में से 31 सीटें दीं लेकिन आपके मंत्रिपरिषद में करीब 55 महीने तक रहने के बाद आपके नेतृत्व से मैं खुद को ठगा हुआ और उपेक्षित महसूस कर रहा हूं। सत्ता में आने के बाद और चुनाव से पहले जो वादे आपने जनता से किए थे उसमें विरोधाभास दिखाई दे रहा है। 2014 और 2015 के चुनाव प्रचार के दौरान आपने बिहार के चीनी मिलों को चालू करने, बिहार को विशेष पैकेज देने, युवाओं को रोजगार मुहैया कराने के अलावा बिहार के गरीब किसानों को बेहतर सुविधा देने का वादा किया था।

लेकिन बहुत ही पीड़ा और दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके नेतृत्व में बिहार के साथ हर स्तर पर न्याय नहीं किया गया। इसके आलवा जातीय जनगणना का प्रकाशन नहीं करना जैसे मुद्दे भी हैं जो रालोसपा की नीतियों के खिलाफ है। जस्टिस जी रोहिणी समिति की ओबीसी कैटेगरी को विभाजित करने की रिपोर्ट को जमा नहीं करने से यह साबित होता है कि सरकार इस मामले में गंभीर नहीं है। इससे ओबीसी में डर और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। विश्विद्यालय प्राध्यापकों की बहाली को लेकर रोस्टर के मुद्दे लंबित रहने की वजह से प्रोफेसरों की नियुक्ति नहीं हो पाई और भ्रम की स्थिति बनी रही। बिहार को विशेष पैकेज देने का वादा भी आपका बड़ा जुमला ही साबित हुआ। भारत सरकार ने बिहार के किसानों को तब बड़ा धोखा दिया, जब किसानों की धान की खरीदारी से केंद्र की सरकार ने हाथ खींच लिए. इससे बिहार के किसानों की हालत और भी खस्ता हो गई। बिहार में जेडीयू-भाजपा की सरकार में कानून-व्यवस्था की स्थिति रोज-ब-रोज बदतर होती जा रही है और अब तो लगने लगा है कि बिहार में कानून का राज नहीं अपराधियों का राज है। कानून-व्यवस्था पहले से भी बदतर हो गई है। स्कूलों और अस्पतालों के निर्माण के लिए ज़मीन मुहैया कराने के वादे कई बार किए गए लेकिन इन वादों को भी पूरा नहीं किया गया। बिहार को लेकर आपके इस व्यवहार से तो मुझे पीड़ा हुई ही है, आपके अलोकतांत्रिक नेतृत्व और काम करने के तरीके से भी मैं बेहद आहत हुआ हूं। आपने मंत्रिपरिषद में कामकाज के जो अधिकार संविधान में दिए गए थे, उसकी लगातार अनदेखी की। आपका मंत्रिमंडल महज़ रबर स्टैंप बन कर रह गया जो बिना किसी विचार-विमर्श या राय देने के आपके आदेश का पालन करता रहा।

केंद्र सरकार के विभागों में कार्यरत मंत्री और अधिकारी सिर्फ दिखावे भर के लिए थे, क्योंकि सारे फैसले आप, पीएमओ और भाजपा अध्यक्ष ही लेते थे। भाजपा अध्यक्ष मंत्रियों के काम में जिस तरह का हस्तक्षेप करते रहे हैं, उससे जिस तरह के फैसले लेते हैं वह असंवैधानिक है। 2015 बिहार विधानसभा चुनाव के समय से ही भाजपा ने रालोसपा को बर्बाद करने का वातावरण बनाया था और पार्टी के साथ जो वादे किए गए थे उसे पूरा नहीं किया गया यहां तक कि शुरुआत में मेरी पार्टी को जितनी सीटें दी गईं थी उसे कम कर दी गईं। इसके अलावा भाजपा ने लोकसभा चुनाव के बाद होने वाले उपचुनाव में भी रालोसपा के साथ छल किया।

आपकी कोशिश हर स्तर पर आरएसएस के एजेंडे को लागू करने की दिखती है जबकि इसके ठीक इसके उलट हमारी प्रतिबद्धता सामाजिक न्याय के एजेंडे को लागू करने की है। इन सब कारणों को घ्यान में रखते हुए मेरे लिए आपके मंत्रिपरिषद में बने रहना मुश्किल है। मेरा विवेक इस बात की इजाजत नहीं दे रहा है कि मैं अब उस सरकार का हिस्सा रहूं जो हर मोर्चे पर विफल रही है और देश के निर्माताओं के सपने और वादों को पूरा करने में नाकाम रही है। मेरे इस्तीफे को अविलंब मंजूर करें ताकि मैं राहत महसूस कर सकूं।
धन्यवाद सहित

आपका ही

(उपेंद्र कुशवाहा)

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